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  • निजी स्कूलों में गरीबों के लिए आरक्षण सही, लेकिन सिर्फ सीटें देने नहीं आएगा बदलाव

    लेखक: विमल कुमारसुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में याद दिलाया है। कि शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) के तहत निजी स्कूलों में 25% सीटें कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित हैं। अदालत की यह टिप्पणी असल में हमारे सामाजिक विवेक को झकझोरने की कोशिश है। कानून का इरादा बिल्कुल नेक है पढ़ाई वह भरोसेमंद टूल है,


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    By Azad Hind Desk जनवरी 23, 2026
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    लेखक: विमल कुमार
    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में याद दिलाया है। कि शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) के तहत निजी स्कूलों में 25% सीटें कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित हैं। अदालत की यह टिप्पणी असल में हमारे सामाजिक विवेक को झकझोरने की कोशिश है। कानून का इरादा बिल्कुल नेक है पढ़ाई वह भरोसेमंद टूल है, जिससे जीवन बदला जा सकता है। लेकिन अर्थशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके नेक इरादों से नहीं, उसके अंतिम परिणाम से होना चाहिए। शिक्षा में परिणाम का मतलब है वह बच्चा वास्तव में सीख रहा है, क्या वह स्कूल में टिक पा रहा है, और क्या उसकी क्षमताएं उसे भविष्य के प्रतिस्पर्धी बाजार के लिए तैयार कर रही हैं?

    सीखने की लागत: समस्या यह है कि हम अक्सर शिक्षा को केवल ‘सीट’ या ‘फीस’ की बहस तक सीमित कर देते हैं। हम मान लेते हैं कि फीस माफ हो गई, तो शिक्षा मुफ्त हो गई। हकीकत में सीखने की कीमत सिर्फ स्कूल की फीस नहीं होती। अर्थशास्त्र में कहें तो हर परिवार को सीखने की लागत चुकानी पड़ती है। इसमें पैसा, समय, मानसिक तनाव और जोखिम सब शामिल हैं।

    बजट के बाहर: निजी स्कूल में दाखिला मिलने पर भी एक गरीब परिवार पर कई प्रत्यक्ष आर्थिक बोझ आते हैं किताबें, यूनिफॉर्म, स्टेशनरी, प्रॉजेक्ट्स का सामान और ट्रांसपोर्ट का खर्च इन सब का हिसाब लगाया जाए, तो महीने का अतिरिक्त खर्च 3 से 5 हजार रुपये तक पहुंच सकता है। एक दिहाड़ी कर्मचारी के लिए यह उसकी कुल मासिक आय का 40 से 50% हिस्सा है।

    छिपी हुई लागत: इससे भी बड़ा खर्च समय और प्रक्रिया की जटिलता का है। दस्तावेजों को बनवाने की जद्दोजहद, पोर्टल की तकनीकी उलझनें और के दफ्तरों के चक्कर गरीब परिवार के लिए यह समय सीधे तौर पर उनकी ‘रोजी-रोटी’ का होता है। अर्थशास्त्री इसे ‘अवसर लागत’ (Opportunity Cost) कहते हैं। यानी स्कूल की एक औपचारिकता पूरी करने के लिए पित को अपनी एक दिन की दिहाड़ी छोड़नी पड़ती है। क्या हमारी नीति ने कभी इस ‘छिपी हुई लागत’ का हिसाब लगाया है?

    मनोवैज्ञानिक दीवार: स्कूल केवल शैक्षणिक केंद्र नहीं, सूक्ष्म समाज भी है वहां बच्चों के बीच खाने के टिफिन, कपड़े, ब्रांडेड जूते, मोबाइल और यहां तक कि अंग्रेजी बोलने के लहने को लेकर अदृश्य प्रतिस्पधां चलती है। जन्मदिन की पार्टियां या स्कूल ट्रिप ‘जैसे ‘रिचुअल्स’ भागीदारी की एक ऊंची कीमत तय करते हैं। जब एक गरीब बच्चा रोज यह महसूस करता है कि वह सहपाठियों से अलग है या पिछड़ रहा है, तो उसकी सीखने की उत्पादकता ( learning productivity) गिरती है। यह एक मनोवैज्ञानिक दीवार है, जो उसे कक्षा में मौजूद तो रखती है, लेकिन सीखने की प्रक्रिया से काट देती है।

    परिवेश का अंतर: यही वह बिंदु है जहां ‘पालिका स्कूल’ और ‘मॉडर्न स्कूल की खाई साफ नजर आती है। एक आधुनिक निजी स्कूल का बच्चा जिस तकनीक, इंटरनेट और एक्सपोजर के बीच बड़ा हो रहा है, क्या 25% कोटे वाला बच्चा घर जाकर उसी परिवेश को
    पा सकता है?

    लो-रिटर्न निवेश: उत्पादन प्रक्रिया है जैसे किसी फैक्ट्री में बेहतर उत्पाद के लिए केवल मशीन (सीट) काफी नहीं, बल्कि कच्चा माल, बिजली और कुशल कारीगर भी चाहिए, वैसे ही शिक्षा के लिए पोषण सुरक्षित घर, अध्ययन का माहौल और अतिरिक्त सहायता जरूरी इनपुट हैं। अगर येइनपुट गायब हैं, तो शिक्षा का ‘आउटपुट’ कम रह जाएगा और हमारी नीति एक ‘लो- ‘रिटर्न निवेश’ बन जाएगी।

    समाधान के रास्ते: पहला, सरकार को केवल फीस की भरपाई नहीं करनी चाहिए, बल्कि ऐसे बच्चों के लिए ‘सपोर्ट पैकेज (यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट और एक्ट्रा ट्यूटरिंग) का फंड भी देना चाहिए। दूसरा, स्कूलों के भीतर एक ‘इनक्लूजन कल्चर’ विकसित करना होगा। कुछ राज्यों के पायलट प्रॉजेक्ट्स बनाते हैं कि जहां ‘बडी सिस्टम’ (अमीर और गरीब बच्चे की जोड़ी) और ‘इनक्लूजन कोऑर्डिनेटर’ नियुक्त किए गए, वहां इन बच्चों के सीखने के स्तर में 30% तक सुधार देखा गया।

    सरकारी स्कूल सुधरें: तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण-सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना ही ‘फर्स्ट-वेस्ट’ पॉलिसी है जब तक सरकारी स्कूल निजी स्कूलों के बराबर खड़े नहीं होंगे, तब तक हम बच्चों को टुकड़ों-टुकड़ों में न्याय देने की कोशिश करते रहेंगे। लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि बच्चा ‘किस’ स्कूल में बैठा है, बल्कि यह होना चाहिए कि वह ‘क्या’ सीख रहा है।
    (लेखक IIT कानपुर के इकॉनमिक्स डिपार्टमेंट और वाधवानी स्कूल ऑफ AT में प्रफेसर हैं)

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