• Religion
  • पूजा करते समय मुख की दिशा बदलते ही बदल जाता है फल, जानें सही दिशा का रहस्य

    पूजा कक्ष कभी भी शयन कक्ष में नहीं बनवाना चाहिए। यदि परिस्थितिवश जगह की कमी के कारण पूजाघर शयनकक्ष में बन ही जाए तो वह शयनकक्ष अविवाहितों के लिए होना चाहिए। यदि परिस्थितिवश विवाहितों को भी उसी शयनकक्ष में सोना है, तो पूजा स्थल पर सभी ओर से पर्दा डालकर रखें और रात को सोने


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk जनवरी 28, 2026
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    पूजा कक्ष कभी भी शयन कक्ष में नहीं बनवाना चाहिए। यदि परिस्थितिवश जगह की कमी के कारण पूजाघर शयनकक्ष में बन ही जाए तो वह शयनकक्ष अविवाहितों के लिए होना चाहिए। यदि परिस्थितिवश विवाहितों को भी उसी शयनकक्ष में सोना है, तो पूजा स्थल पर सभी ओर से पर्दा डालकर रखें और रात को सोने से पूर्व पूजास्थल का पर्दा ढक दें, परन्तु यह व्यवस्था केवल स्थानाभाव के कारण ही होनी चाहिए। लेकिन यदि आपके घर में पर्याप्त जगह है, तो पूजास्थल शयनकक्ष से हटाकर ही बनवाना चाहिए।

    वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजाघर की दिशा ईशान कोण यानी पूर्वोत्तर के कोने में सबसे ज्यादा उपयुक्त मानी गई है। पूजाकक्ष को सदैव शुद्ध, स्वच्छ एवं पवित्र रखें, इसमें कोई भी अपवित्र वस्तु न रखें। पूजाकक्ष के निकट एवं भवन के ईशान कोण में झाड़ू एवं कूड़ेदान आदि नहीं रखने चाहिए। सम्भव हो तो पूजाकक्ष को साफ करने का झाड़ू-पोंछा भवन के अन्य कक्षों को साफ करने के झाड़ू-पोंछे से अलग रखें।

    वास्तु और ज्योतिष, दोनों का संयुक्त रूप से निष्कर्ष है कि मनुष्य जिस दिशा में मुख करके पूजा करता है, उस दिशा से संबंधित ऊर्जा उसके जीवन को प्रभावित करती है। उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा कहा गया है, कुबेर धन, वैभव और भौतिक समृद्धि के अधिष्ठाता हैं। जब साधक उत्तर की ओर मुख करके पूजा करता है, तो वह समृद्धि की सकारात्मक तरंगों से जुड़ता है, इससे आय, स्थिरता और संसाधनों के प्रति अनुकूलता बढ़ती है। यही कारण है कि धन-प्राप्ति की कामना रखने वालों के लिए उत्तराभिमुख पूजा का विधान बताया गया है। वहीं पूर्व दिशा सूर्य की दिशा है। सूर्य को ज्ञान, चेतना, आत्मबल और विवेक का स्रोत माना गया है। पूर्व की ओर मुख करके की गई पूजा अंतर्मन को जाग्रत करती है, बुद्धि को तेज करती है और अध्ययन, साधना व आत्मिक विकास में सहायक होती है, इसलिए ज्ञान-प्राप्ति, विद्या और आत्मबोध के लिए पूर्वाभिमुख पूजा को श्रेष्ठ माना गया है। वास्तु विशेषज्ञों के मत के अनुसार धन-प्राप्ति हेतु पूजा, पूजा कक्ष में उत्तर की ओर मुख करके करनी चाहिए एवं ज्ञान-प्राप्ति के लिए पूर्व की ओर मुख करके।

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।