इसने पोल खोलते हुए लिखा है कि पाकिस्तान की यह रणनीति नाकामियों को छिपाने और राष्ट्रीय घेराबंदी की कहानी को मजबूत करने के लिए बनाई गई है, यह कोई राज चलाने की नीति नहीं बल्कि एक लंबे प्रोपेगेंडा अभियान का हिस्सा है। जबकि बलूच अलगाववादी नेता बशीर जेब की तस्वीरों ने साबित कर दिया है कि बलूचिस्तान के लोगों का विश्वास पाकिस्तान तेजी से खोता जा रहा है। तालिबान नियंत्रित रेडियो ने खास तौर पर बशीर जेब का नाम लिया है और पाकिस्तान की पोल खोली है।
बशीर जेब पर पाकिस्तान कैसे हो गया बेनकाब?
दरअसल, पाकिस्तान हमेशा से कहता आया है कि बशीर जेब, उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान के संरक्षण में रहता है। लेकिन बलूचिस्तान में हुए ताजा हमले में बशीर जेब को एक बाइक पर हमलावरों का नेतृत्व करते देखा गया है। जबकि पाकिस्तान उसे विदेशी देशों की तरफ से बनाया गया खतरा कहता रहा है। बशीर जेब के दिखने से साफ हो गया है कि वो बलूचिस्तान से ही अपने ऑपरेशन ऑपरेट कर रहा है। वही ऑपरेशन हेरोफ 2.0 को लीड कर रहा था। तालिबानी मीडिया ने कहा है कि बशीर जेब के दिखने से साफ हो गया है कि पाकिस्तान जो वर्षों से दावे करता आया है, वो झूठ और मनगढंत था।
हुर्रियत रेडियो ने कहा है कि पाकिस्तान की मीडिया, जो झूठी कहानी गढ़ने में माहिर है, उसे मजबूर होकर बशीर जेब पर कबूल करना पड़ा है कि वो बलूचिस्तान से ही ऑपरेट कर रहा है। पाकिस्तान की सरकार और उसके मीडिया तंत्र, दोनों के दावे इतने पारदर्शी तरीके से झूठे साबित होते हैं, तो नतीजा उनकी विश्वसनीयता पर गहरा संकट होता है। जनता यह सवाल करने लगती है कि इन चैनलों की तरफ से फैलाई गई बातों में से किस पर विश्वास किया जा सकता है।
‘पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण हो रहा कमजोर’
तालिबान ने कहा है कि पाकिस्तान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के नेताओं को लेकर भी ऐसे ही झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाए हैं। पाकिस्तान और उसके मीडिया संस्थान बार बार यही करते हैं और ऐसा करना उनकी रणनीति को दिखाता है। इनका मकसद मूल कारणों को हल करना नहीं है, बल्कि बाहरी खतरे की एक स्थायी स्थिति पैदा करना है, ताकि सत्तावादी नियंत्रण को सही ठहराया जा सके और नीतिगत नाकामियों को छिपाया जा सके। लेकिन आज के सूचना युग में, जहां तथ्यों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाता है और काउंटर नैरेटिव फैलाई जा सकती हैं, ऐसे प्रोपेगैंडा बहुत जल्दी दम तोड़ देते हैं।
तालिबान नियंत्रित रेडियो की वेबसाइट पर लिखा गया है कि “इस नाकाम रणनीति के नतीजे पाकिस्तान की अपनी राजनीति में पहले से ही दिख रहे हैं। अशांत कबायली इलाकों में सरकार का असर कम हो गया है, असंतोष उफान मार रहा है। धार्मिक वर्गों के बीच भी उसकी स्थिति इसी तरह खराब हुई है, जिससे मदरसों तक पहुंच बनाकर विश्वसनीयता हासिल करने की बेताब कोशिशें की जा रही हैं। फिर भी, ये कोशिशें आखिरकार दिखावटी हैं और ये मूल मुद्दे को हल नहीं करतीं। दूसरों पर दोष डालने से अंदरूनी घाव नहीं भर सकते और न ही यह उन हाशिए पर पड़े समुदायों के जायज गुस्से को शांत कर सकता है जिनके अधिकारों और अवसरों को जबरदस्ती और अनदेखी करके व्यवस्थित रूप से छीन लिया गया है।














