सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस साल मार्च में खत्म हुए वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था 7.4% बढ़ी है। यह लगातार दूसरे साल दुनिया में सबसे तेज विकास दर है। लेकिन सुब्रमण्यन ने इस आंकड़े को सावधानी से देखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह अनुमान पुरानी समस्या यानी मापने की सटीकता से प्रभावित हो सकता है। उन्होंने जीडीपी की गणना में इस्तेमाल होने वाले डिफ्लेटर (मुद्रास्फीति को हटाने वाला आंकड़ा) के असामान्य रूप से कम होने का भी जिक्र किया।
बदल जाएगा जीडीपी का नाम! अर्थव्यवस्था मापने के तरीके में बदलाव की तैयारी, क्या होगा नया पैमाना?
अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ साफ नहीं
सुब्रमण्यन ने कहा कि यह साफ नहीं है कि अर्थव्यवस्था सुधर रही है। उन्होंने कहा कि जो आंकड़े हमें अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति बताते हैं, वे धीमे हो रहे हैं। साथ ही, नाममात्र की वृद्धि दर (बिना मुद्रास्फीति के) भी कम हो रही है। इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार और दिशा दोनों पर सवाल उठता है। उन्होंने कहा, ‘मैं विकास दर का कोई सटीक आंकड़ा नहीं बता सकता, लेकिन अगर अगले साल विकास दर इस साल जैसी ही रहती है, तो भारत को खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए और इसे एक बड़ी उपलब्धि समझना चाहिए, खासकर इस अनिश्चितता के माहौल में।’
क्यों जताई चिंता?
सुब्रमण्यन ने अमेरिका की व्यापार नीति से जुड़े जोखिमों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए 50% टैरिफ अभी भी चिंता का विषय हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अब ऐसा कम ही लग रहा है कि कोई व्यापार समझौता होगा। उन्होंने यह भी कहा कि टैरिफ की दरें और बढ़ सकती हैं।
चीन की व्यापार नीतियां भी चिंता का एक और कारण हैं। उन्होंने बताया कि चीन का तेजी से निर्यात करना और अपने सामानों को भारत जैसे विकासशील देशों में भेजना, घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है। वहीं सरकारी खजाने से जुड़े मुद्दे भी चिंता का विषय बने हुए हैं। इसका एक कारण गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में की गई कटौती भी है।
उपाय भी बताया
सुब्रमण्यन ने यह भी बताया कि भारत कैसे गति पकड़ सकता है। उन्होंने निर्यातकों को बाहरी झटकों से बचाने के लिए भारत की मुद्रा नीति में अधिक लचीलेपन की मांग की। उन्होंने कहा कि जब सरकारी खजाने में ज्यादा पैसा न हो, तो मुद्रा का अवमूल्यन (रुपये का गिरना) सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को पूरी तरह से लचीला बनाने में हिचकिचाता हुआ दिख रहा है। इस नीति पर और गहराई से विचार करने की जरूरत है।













