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  • भारत के लिए क्यों जरूरी चाबहार बंदरगाह? अमेरिकी दबाव के बावजूद नहीं छोड़ सकता नई दिल्ली

    नई दिल्ली: ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या भारत अमेरिका के दबाव में ईरान के चाबहार बंदरगाह से पीछे हट सकता है। हालांकि विदेश मंत्रालय


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    By Azad Hind Desk जनवरी 18, 2026
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    नई दिल्ली: ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या भारत अमेरिका के दबाव में ईरान के चाबहार बंदरगाह से पीछे हट सकता है। हालांकि विदेश मंत्रालय ने इसे खारिज कर दिया। चाबहार सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक जरूरत है। अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत इससे पीछे हटना नहीं चाहता, क्योंकि यह भारत को वेस्टर्न और सेंट्रल एशिया में मजबूत स्थिति देता है।

    चाबहार पोर्ट कहां है ?

    चाबहार ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर, ओमान की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है। यह ईरान का पहला गहरे पानी वाला बंदरगाह है।

    क्यों खास है बंदरगाह?

    यह रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। पाकिस्तान को बाइपास कर भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ता है। चीन-पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के मुकाबले भारत का संतुलन बनाता है।

    भारत की चाबहार में क्या भूमिका?

    • 2002-03 में भारत की भागीदारी से शुरू हुई। 2016 में भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ।
    • 12 करोड़ डॉलर के उपकरण की भारत ने प्रतिबद्धता जताई
    • 25 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन देने का भी करार हुआ
    • 2024 में 10 साल के संचालन का करार

    अमेरिका ने पहले भी रुकावट डाली है?

    हां, कई बार। 2003 और 2018 में ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए। हालांकि, चाबहार को अफगानिस्तान के लिए जरूरी मानते हुए अमेरिका ने भारत को छूट दी थी। यह अप्रैल 2026 तक वैध है।

    पोर्ट को क्यों नहीं छोड़ सकता भारत?

    पोर्ट से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच मिलती है। रूस और यूरोप तक माल भेजने में समय और लागत भी कम लगती है। इंटरनैशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का अहम हिस्सा भी है।

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