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  • भारत बनेगा अगला अमेरिका! आ चुका है मौका, आखिर हम पर क्यों है पूरी दुनिया की नजर?

    नई दिल्ली: भारत की डिफेंस इंडस्ट्री में पिछले कुछ साल में जबरदस्त बदलाव देखने को मिला है। उदारीकरण के बाद शायद ही भारत के किसी दूसरे सेक्टर में इतना बदलाव आया है। कभी डिफेंस सेक्टर पूरी तरह से आयात पर निर्भर था और इसमें सरकारी कंपनियों का ही दबदबा था। लेकिन पिछले एक दशक में


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    By Azad Hind Desk जनवरी 9, 2026
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    नई दिल्ली: भारत की डिफेंस इंडस्ट्री में पिछले कुछ साल में जबरदस्त बदलाव देखने को मिला है। उदारीकरण के बाद शायद ही भारत के किसी दूसरे सेक्टर में इतना बदलाव आया है। कभी डिफेंस सेक्टर पूरी तरह से आयात पर निर्भर था और इसमें सरकारी कंपनियों का ही दबदबा था। लेकिन पिछले एक दशक में नीतियों में लगातार सुधार, संस्थागत बदलाव और सरकार की प्राथमिकता के चलते इसका कायाकल्प हो चुका है। आज दुनिया में उथल-पुथल, व्यापार युद्ध, प्रतिबंधों और बढ़ते सैन्य संघर्षों के बीच इंडियन डिफेंस इंडस्ट्री के लिए यह एक बड़ा मौका है कि वह अपनी इस तेज रफ्तार को और बढ़ाए। माना जाता है कि अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध में दोनों पक्षों को हथियार बेचकर महाशक्ति बना था। क्या अब भारत के पास भी वैसा मौका आ चुका है?

    दुनिया भर की सप्लाई चेन बिखर रही है और कई देश भरोसेमंद पार्टनर को खोज रहे हैं। ऐसे में भारत डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में एक बड़ी ताकत बनकर उभर सकता है। यह ऐसा क्षेत्र है जो औद्योगिक विकास को सहारा दे सकता है, निर्यात को बढ़ा सकता है, तकनीकी क्षमता को मज़बूत कर सकता है और साथ ही देश की सुरक्षा को भी मजबूत कर सकता है। यानी भारत एक साथ कई निशाने साध सकता है। ऐसे में 1 फरवरी को आने वाले बजट पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। यह पिछले कुछ साल में हासिल की गई सफलताओं को और मजबूत करने, कमियों को दूर करने और रक्षा निर्माण में लंबी अवधि की योजना बनाने का समय है।

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    आयात पर निर्भरता

    भारत के डिफेंस इंडस्ट्री में ऐतिहासिक रूप से एक विरोधाभास रहा है। दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक होने और एक विशाल घरेलू बाजार होने के बावजूद भारत दशकों तक एक प्रतिस्पर्धी स्वदेशी औद्योगिक आधार विकसित करने में नाकाम रहा। रक्षा उत्पादन मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों और ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों तक ही सीमित था। नई चीजें बनाने की प्रक्रिया धीमी थी और निजी क्षेत्र को इससे दूर ही रखा गया। पिछले एक दशक में इस स्थिति को बदला गया है।

    खरीद, लाइसेंसिंग, निर्यात नियंत्रण और एफडीआई नीतियों में लगातार सुधारों ने इस क्षेत्र को खोला है। आयात पर निर्भरता कम की गई है और घरेलू सामान की खरीद को बढ़ावा दिया गया है। अब सिर्फ असेंबलिंग के बजाय पूरा ईकोसिस्टम डेवलप करने पर जोर दिया जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि देश में उत्पादन बढ़ रहा है, निर्यात आसमान छू रहा है, स्वदेशी हथियारों और उपकरणों की एक लंबी कतार तैयार हो रही है। डिफेंस इंडस्ट्रियल ईकोसिस्टम में अब बड़ी निजी कंपनियां, छोटी और मझोली कंपनियां और कई नए स्टार्ट-अप्स भी शामिल हो गए हैं। कंपनियों को केवल सरकारी मांग पर निर्भर रहने के बजाय प्रतिस्पर्धा करने और नई चीजें बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

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    डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग

    भारत के पास डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में अपनी पावर दिखाने का यह अच्छा मौका है क्योंकि रक्षा साजोसामान निर्यात करने वाले कई बड़े देश मुश्किलों का सामना कर रहे हों। सर्विसेज एक्सपोर्ट विकसित देशों में नियमों के सख्त होने से प्रभावित हो सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण अभी भी पूर्वी एशियाई सप्लाई चेन पर निर्भर है। ग्रीन टेक्नोलॉजीज पर सब्सिडी वॉर और स्थानीय उत्पादन की अनिवार्यता का खतरा बढ़ रहा है।

    इसके विपरीत डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग एक अलग वैश्विक तर्क के तहत काम करता है। जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ रहे हैं और सुरक्षा को लेकर चिंताएं गहरी हो रही हैं, वैसे-वैसे इसकी मांग भी बढ़ रही है। खरीदार सबसे कम कीमत के बजाय विश्वसनीयता, राजनीतिक विश्वास और लंबी अवधि के सपोर्ट को प्राथमिकता देते हैं। एक बार जब डिफेंस सप्लाई रिलेशनशिप स्थापित हो जाते हैं, तो वे अक्सर मजबूत और टिकाऊ हो जाते हैं। भारत-रूस संबंध इसका प्रबल उदाहरण है।

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    भारत के लिए मौका

    भारत के लिए यह एक दुर्लभ अवसर है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन सीधे तौर पर आयात की जगह लेता है, जिससे करंट अकाउंट में सुधार होता है और विदेशी मुद्रा बचती है। साथ ही, रक्षा निर्यात हाई-वैल्यू रेवेन्यू स्ट्रीम्स बनाता है, जिसका मेटलर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह क्षेत्र अपनी सप्लाई चेन में लेबर-इंटेंसिव है, जबकि शीर्ष स्तर पर यह कैपिटल-इंटेंसिव और टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव है, जो इसे व्यापक औद्योगिक विकास के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बनाता है। इसके अलावा, रक्षा निर्माण भारत को ग्लोबल स्ट्रेटेजिक नेटवर्क्स में शामिल करता है।

    वस्तुओं के निर्यात के विपरीत, रक्षा निर्यात डिप्लोमैटिक लेवरेज और दीर्घकालिक साझेदारी को गहरा करता है, जिससे तेजी से मल्टीपोलर होती दुनिया में भारत की स्थिति मजबूत होती है। भारत के रक्षा उद्योग में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक यह है कि अब अलग-अलग उत्पादन इकाइयों के बजाय धीरे-धीरे एक व्यवस्था उभर रही है। बड़ी निजी कंपनियां जहाज निर्माण, एयरोस्पेस, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और लैंड सिस्टम्स में निवेश कर रही हैं।

    कैसे मिलेगा फायदा?

    MSMEs टियर-2 और टियर-3 आपूर्तिकर्ताओं के रूप में वैश्विक और घरेलू सप्लाई चेन में एकीकृत हो रहे हैं। स्टार्ट-अप्स ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, AI-एनेबल्ड सर्विलांस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे विशेष क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं। डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग तभी प्रतिस्पर्धी हो सकता है जब वह कुछ चुनिंदा वर्टिकली इंटीग्रेटेड एंटिटीज पर निर्भर न हो। स्केल, रिडंडेंसी, इनोवेशन और कॉस्ट कंट्रोल तभी संभव है जब हजारों कंपनियां पूरी वैल्यू चेन में भाग लें।

    भारत में यह सेक्टर अब गति पकड़ने लगा है लेकिन फिर भी यह व्यवस्था अभी भी असमान है। एम्युनिशन और मिसाइल, नेवल प्लेटफॉर्म्स और इन्फ्रा इलेक्ट्रॉनिक्स ने तेजी से प्रगति की है। भारत के निर्यात में स्पेयर पार्ट्स और कंपोनेंट्स से आगे बढ़कर पूरे प्लेटफॉर्म, मिसाइल, आर्टिलरी सिस्टम्स, नौसैनिक जहाजों और ड्रोन को शामिल किया गया है। ऐसे समय में जब कई पारंपरिक आपूर्तिकर्ता राजनीतिक बाधाओं, उत्पादन की समस्याओं या प्रतिष्ठा संबंधी मुद्दों का सामना कर रहे हैं, भारत खुद को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में पेश कर सकता है। फ्लेक्सिबल फाइनेंसिंग, प्रशिक्षण पैकेज और लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस सपोर्ट से हम फायदा उठा सकते हैं।

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