दूसरा, ये इंटरव्यू करीब एक दशक के अंतराल के बाद किए गये हैं। 2015 में इंटरव्यू किए गए प्रवासियों के आखिरी बैच को आखिरकार 2021 में शावेई इजरायल योजना के तहत इजरायल भेजा गया था। ये इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी माइकल फ्रायंड की तरफ से स्थापित एक प्राइवेट संगठन है। मौजूदा अलियाह प्रक्रिया में फ्रायंड की कोई भूमिका नहीं है। इस बार, चूंकि अलियाह चाहने वाले ज्यादातर आवेदक मणिपुर के चुराचांदपुर के कुकी समुदाय के लोग थे, इसलिए उन्हें आइजोल लाने के लिए बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था की गई थी। इस काम में शामिल लोगों के मुताबिक, लगभग 10 मिनीबस और SUV ने आवेदकों को पहाड़ियों से होते हुए 10 घंटे की खतरनाक यात्रा कराई। मिजोरम पुलिस ने इजरायली प्रतिनिधिमंडल को सुरक्षा कवर प्रदान किया था, जिसमें डेयानिम—रैबिनिकल जज शामिल थे, जिन्हें चुने गए उम्मीदवारों की जांच का काम सौंपा गया था।
इजरायल जाएंगे बेनी मेनाशे समुदाय के लोग
जिन लोगों का इंटरव्यू लिया गया है, उनमें अलग अलग तरह के लोग शामिल हैं। उनमें 34 साल के आसफ रेंथले भी थे, जो सेंट स्टीफंस कॉलेज के पूर्व छात्र हैं और उनके पास जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से MPhil की डिग्री है। इस ग्रुप में दिहाड़ी मजदूर और अमीर लोग भी शामिल थे, जैसे 65 साल के नादव हौहनार और उनकी पत्नी 62 साल की याफा, जिनके पास आइजोल के बीचों-बीच एक बड़ा चार मंजिला घर है। ज्यादातर परिवारों के कई रिश्तेदार पहले से ही इजरायल में रह रहे हैं। याफा हौहनार कहती हैं कि “जब मेरा सबसे बड़ा बेटा माइग्रेट हुआ था, तब उसकी शादी भी नहीं हुई थी।” उनका बेटा अब यरूशलेम के बाहरी इलाके में एक रेस्टोरेंट में शेफ का काम करता है। उन्होंने कहा कि “अब मेरे वहां तीन पोतियां और एक पोता है। वे सभी 2021 में हमसे मिलने आए थे। बदकिस्मती से, मेरे पोते-पोतियां मिज़ो नहीं बोल पाते।”
33 साल की रूथ हैंगसिंग ने कहा कि “मैं कोच्चि के एक रेस्टोरेंट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम कर रही थी।” उनका परिवार मिजोरम के कोलासिब जिले के हेब्रोन गांव में किराए के मकान में रहता है। उन्होंने कहा कि “जब मैंने सुना कि रब्बी आइजोल आ रहे हैं, तो मैंने नौकरी छोड़ दी और घर लौट आई।” यह पक्का नहीं होने पर कि माइग्रेट करने की उसकी बारी कब आएगी, रूथ कहती है कि वह अब अपनी मां को खियाबा – पारंपरिक कूकी हार – बनाने और बेचने में मदद कर रही है ताकि घर का खर्च चल सके।
इजरायल जाने में क्यों हो रही है देरी?
हालांकि पिछले महीने इंटरव्यू हुए हैं, लेकिन इनके इजरायल जाने में काफी देरी हो रही है। बनेई मेनाशे समुदाय के लिए इजरायल का रास्ता कभी आसान नहीं रहा। यह 1950 के दशक में शुरू हुआ जब मेला चाला, जो एक मिजो थे, उन्होंने इस विचार को लोकप्रिय बनाया कि मिजो लोग, इजरायल की खोई हुई जनजातियों में से एक के वंशज हैं। उन्होंने उन बातों पर ध्यान दिलाया, जिन्हें वे चिन-कूकी-मिज़ो परंपराओं और यहूदी रीति-रिवाजों के बीच चौंकाने वाली समानताएं मानते थे। यह विश्वास इतना मज़बूत था कि कुछ लोग पैदल ही इज़राइल की ओर निकल पड़े, लेकिन उन्हें असम के सिलचर में पुलिस ने रोक दिया और वापस भेज दिया। 2005 में आया इजरायल के मुख्य रब्बी ने भी औपचारिक रूप से बनेई मेनाशे को “इजराइल का बीज” बताया और यहूदी के तौर पर उन्हें मान्यता दे दी। इसी के बाद उन्हें इजरायल वापस ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। माना जा रहा है कि इजरायल लगातार संघर्षों में फंसा हुआ है, इसीलिए ये देरी हो रही है।














