चूंकि ये विशिष्ट कानूनों द्वारा शासित सशस्त्र बल हैं, इसलिए अदालतों को परिचालन दक्षता बनाए रखने के लिए बनाए गए सेवा नियमों को एकतरफा रूप से नहीं बदलना चाहिए।’ केंद्र सरकार की ओर से तटरक्षक बलों के कर्मियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाकर 60 साल करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर एक याचिका में यह अपील की गई है।
मामले में केंद्र सरकार विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नोटिस जारी करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें भारतीय तटरक्षक बल के सभी कर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष निर्धारित की गई थी। भारत संघ बनाम चीली जे रत्नम के इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने क्या दिया निर्देश
- वर्डिक्टम पर छपी एक स्टोरी के अनुसार, केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें भारतीय तटरक्षक बल कर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर 60 वर्ष कर दी गई थी। सरकार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने तटरक्षक बल को सीआरपीएफ जैसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के बराबर गलत तरीके से माना है।
- इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने आदेश दिया-नोटिस जारी करते हैं। इस बीच, विवादित फैसले का संचालन स्थगित रहेगा… प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से वकील नोटिस स्वीकार करते हैं। दो सप्ताह के भीतर प्रतिवाद हलफनामा दाखिल किया जा सकता है…। मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पैनल बनाने का दिया निर्देश
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तटरक्षक बल कर्मियों की सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया।
- समिति को भर्ती से लेकर सेवानिवृत्ति तक की पूरी अवधि की जांच करने का कार्य सौंपा गया और उसे आगे की समीक्षा के लिए अपनी रिपोर्ट न्यायालय को प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दी दलील
- केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि अगर तटरक्षक बलों में सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष ही बनी रहती है, तो इससे सेना की अन्य शाखाओं से भी इसी प्रकार की याचिकाओं का सिलसिला शुरू हो जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि सशस्त्र बलों में सेवानिवृत्ति की आयु भर्ती की आयु से सावधानीपूर्वक जुड़ी होती है ताकि सेवा की एक निश्चित अवधि सुनिश्चित हो सके।
- केंद्र सरकार के वकीलों ने इस बात पर जोर दिया कि ये मामले नीतिगत दायरे में आते हैं और इनका निर्णय न्यायपालिका के बजाय विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए। सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किया और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी।
क्या है वो नियम, जिस पर फंसा पेंच
- दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष भारतीय तटरक्षक बल के सेवानिवृत्त या सेवारत अधिकारियों और नामांकित व्यक्तियों ने तटरक्षक बल (सामान्य) नियम, 1986 के नियम 20 की संवैधानिकता को चुनौती दी है।
- इस नियम के तहत, कमांडेंट और उससे नीचे के रैंक के अधिकारियों के साथ-साथ सभी नामांकित व्यक्तियों (अधीनस्थ अधिकारियों और नाविकों) को 57 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होना अनिवार्य था। इसके विपरीत, कमांडेंट से उच्च रैंक के अधिकारियों को 60 वर्ष की आयु तक सेवा करने की अनुमति थी।
- इस पर हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया-हम मानते हैं कि 1986 के नियमों के विवादित नियम 20(1) और 20(2) भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, क्योंकि वे कमांडेंट और उससे नीचे के रैंक के अधिकारियों और नामांकित व्यक्तियों की सेवानिवृत्ति की आयु 57 वर्ष निर्धारित करते हैं। इसलिए, इन्हें रद्द किया जाता है। हमारा मानना है कि तटरक्षक बल के सभी रैंकों के अधिकारियों पर सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष लागू होगी।
कोर्ट ने कहा-सेनानिवृत्ति की उम्र ब्रिटिश पैटर्न पर आधारित
- वर्डिक्टम पर छपी एक स्टोरी में कहा गया है कि न्यायालय ने टिप्पणी की कि वर्तमान सेवानिवृत्ति आयु पुराने ब्रिटिश काल के पैटर्न का अनुसरण करती प्रतीत होती है।
- न्यायाधीशों ने कहा कि 1978 में तटरक्षक अधिनियम पारित होने के बाद से जीवन प्रत्याशा और शारीरिक फिटनेस मानकों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।
- न्यायालय ने सुझाव दिया कि ऐसे परिष्कृत और मजबूत बल में अनुभव का बहुत महत्व है और टिप्पणी की कि सरकार को सेवा शर्तों के प्रति अपने दृष्टिकोण में अत्यधिक स्थिर या रूढ़िवादी नहीं होना चाहिए।
तटरक्षक बल कर्मियों के याचिकाकर्ताओं ने क्या दी दलील
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह तीन साल का अंतर अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक भेदभाव पैदा करता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- न्यायालय ने गौर किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के देव शर्मा बनाम भारत-तिब्बत सीमा पुलिस मामले में दिए गए पिछले फैसले के बाद बीएसएफ, सीआरपीएफ और आईटीबीपी जैसी अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में इसी तरह की असमानताओं को पहले ही समाप्त कर दिया गया था। उस मामले में, न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि इन बलों के सभी कर्मियों को 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होना चाहिए।
रक्षा मंत्रालय ने इस मामले में क्या दी है दलील
- रक्षा मंत्रालय ने कहा-चूंकि तटरक्षक बल तकनीकी रूप से रक्षा मंत्रालय के अधीन एक अर्धसैनिक बल है, न कि गृह मंत्रालय के अधीन सीएपीएफ। ऐसे में देव शर्मा का फैसला स्वतः इस पर लागू नहीं होता। रक्षा मंत्रालय और तटरक्षक मुख्यालय ने सेवानिवृत्ति की आयु को बराबर करने से इनकार कर दिया।
- उन्होंने निचले रैंकों के लिए कम सेवानिवृत्ति आयु को यह तर्क देकर उचित ठहराया कि तटरक्षक बल एक समुद्री सेवा होने के नाते, जहाजों और विमानन प्लेटफार्मों पर परिचालन दक्षता बनाए रखने के लिए युवा आयु वर्ग की आवश्यकता होती है।
- उन्होंने यह भी बताया कि जमीनी बलों के विपरीत, समुद्र से चिकित्सा सहायता प्राप्त निकासी कठिन और समय लेने वाली होती है, जिससे वृद्ध कर्मियों के लिए समुद्र में सेवा करना जोखिम भरा हो जाता है। उच्च न्यायालय ने इन तर्कों को निराधार पाया।
- पीठ ने टिप्पणी की कि तटरक्षक बल अब भारत का एकमात्र अर्धसैनिक बल है जो इस तरह की असमानता बनाए रखता है। न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार तीन साल पहले निचले रैंक के अधिकारियों को सेवानिवृत्त करने और बल की दक्षता बनाए रखने के बीच कोई तार्किक संबंध बताने में विफल रही है।
हाईकोर्ट ने यह सुना दिया फैसला
- हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया-नियम 20(1) और 20(2) इस हद तक असंवैधानिक थे कि उन्होंने निचले रैंकों के लिए कम सेवानिवृत्ति आयु निर्धारित की थी। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु अब तटरक्षक बल के सभी रैंकों पर लागू होगी।
- जिन याचिकाकर्ताओं ने मामले की सुनवाई के दौरान 57 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनके लिए न्यायालय ने निर्देश दिया कि उन्हें 60 वर्ष की आयु तक सेवारत माना जाए और उनके बकाया का भुगतान किया जाए तथा तदनुसार पेंशन लाभों की पुनर्गणना की जाए।














