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  • म्यांमार में चीन-पाकिस्तान की एंट्री, भारत को तीन तरफ से घेरने का बुना जा रहा जाल, एक्सपर्ट ने दी चेतावनी

    नेपीडा: म्यांमार के विदेश मंत्री थान स्वे 24 जनवरी को चार दिन के पाकिस्तान दौरे पर पहुंचे हैं। दौरे का मकसद म्यांमार और पाकिस्तान ने संबंध सुधारना कहा गया है। यह पाकिस्तान की बांग्लादेश के साथ ही म्यांमार में दखल बढ़ाने की कोशिश दिखाता है। चीन पहले ही म्यांमार में अपना मजबूत प्रभाव रखता है।


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    By Azad Hind Desk जनवरी 27, 2026
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    नेपीडा: म्यांमार के विदेश मंत्री थान स्वे 24 जनवरी को चार दिन के पाकिस्तान दौरे पर पहुंचे हैं। दौरे का मकसद म्यांमार और पाकिस्तान ने संबंध सुधारना कहा गया है। यह पाकिस्तान की बांग्लादेश के साथ ही म्यांमार में दखल बढ़ाने की कोशिश दिखाता है। चीन पहले ही म्यांमार में अपना मजबूत प्रभाव रखता है। पाकिस्तान और चीन के अच्छे संबंध हैं जबकि इन दोनों देशों से भारत के दशकों पुराने विवाद हैं। इस स्थिति में भारत का पड़ोसी देशों में प्रभाव घटना और चीन-पाकिस्तान के वहां पैर जमाना दिल्ली के लिए क्षेत्र में नई भू-राजनीतिक चुनौतियां खड़ा कर सकता है

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट कहती है कि शेख हसीना के 2024 में सत्ता से हटने के बाद ढाका में इस्लामाबाद का दखल तेजी से बढ़ा है। दूसरी ओर चीन ने 2021 में नाेपीडा में सेना ने तख्तापलट करके चुनी हुई सरकार को हटाने के बाद से म्यांमार में अपना प्रभाव बढ़ाया है। वह म्यांमार में सभी पक्षों से संपर्क रखता है।

    म्यांमार क्यों भारत की बड़ी चुनौती

    ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के श्रीराधा दत्ता का कहते हैं, ‘भारत को बांग्लादेश की तुलना में म्यांमार के साथ अपने संबंधों को संभालने में अधिक जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत ने सेना और सत्ता प्रतिष्ठान के साथ काम किया है लेकिन सिविल सोसायटी चाहती है कि म्यांमार में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत ज्यादा गहराई से जुड़े, जो आसान नहीं है। पाकिस्तान की म्यांमार में एंट्री इसे और मुश्किल बना सकती है।

    साल 2021 के तख्तापलट के बाद से म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भारत ज्यादा सतर्क है। चीन लंबे समय से म्यांमार की सेना को हथियार और ट्रेनिंग दे रहा है। पिछले साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बुलावे पर शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए म्यांमार के जुंटा नेता मिन आंग हलिंग ने तियानजिन का दौरा भी किया है।

    भारत और चीन का मुकाबला

    नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के अंगशुमन चौधरी कहते हैं, ‘भारत उम्मीद कर रहा था कि जुंटा के साथ उसके लंबे समय से चले आ रहे संबंध म्यांमार पर चीन के प्रभाव का मुकाबला कर सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ है, बीजिंग ने जुंटा और म्यांमार के शक्तिशाली जातीय सशस्त्र संगठनों दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे हैं।’

    म्यांमार में भारत और चीन कई बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। भारत की भागीदारी में राखिन में सिटवे बंदरगाह को समुद्र, नदी और सड़क मार्ग से कोलकाता को जोड़ने के लिए 484 मिलियन अमेरिकी डॉलर के कॉरिडोर का विकास शामिल है। वहीं चीन युन्नान प्रांत को राखिन के क्यौकफ्यू शहर से जोड़ने वाली अरबों डॉलर की रेल और सड़क परियोजना का विकास कर रहा है।

    भारत की क्षेत्रीय प्रभाव की महत्वाकांक्षा

    पूर्व भारतीय राजनयिक केपी फेबियन का मानना है कि पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंधों को गहरा करने की दिल्ली की नीति हाल के सालों में कमजोर पड़ी है। बांग्लादेश में भारत हसीना पर बहुत ज्यादा निर्भर था, जबकि म्यांमार में सेना पर उसका सीमित प्रभाव रहा। चीन और पाकिस्तान की कोशिश भारत को एशियाई नेता के रूप में उभरने से रोकने की है।

    फेबियन ने कहा कि भारत को यह समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान और चीन का गहरा संबंध है। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि दोनों ने यह सोच बना ली है कि भारत के खिलाफ एकजुट होना उनके हित में है। ऐसे में दोनों मिलकर बांग्लादेश, म्यांमार जैसे भारत के पड़ोसी देशों में ‘घुसपैठ’ की कोशिश में लगे हैं।

    भारत को प्रभाव बनाए रखना होगा

    वॉशिंगटन में ईस्ट-वेस्ट सेंटर की एक एडजंक्ट फेलो निलंथी समरनायके का कहना है भारत अभी भी क्षेत्रीय प्रभाव रखता है। उतार-चढ़ाव के बावजूद दिल्ली ने मालदीव और श्रीलंका के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने में कामयाबी पाई। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह म्यांमार और बांग्लादेश में चुनौती का सामना कर रहा है।

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