• National
  • यूजीसी के नए नियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल, प्रावधान पर रोक लगाने की मांग

    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाल ही में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 के विनियमन 3(सी) को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इसके तहत जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध दिया गया संरक्षण गैर-समावेशी है। यूजीसी रेग्युलेशन रूल्स 3(सी) के अनुसार,


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk जनवरी 27, 2026
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाल ही में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 के विनियमन 3(सी) को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि इसके तहत जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध दिया गया संरक्षण गैर-समावेशी है।

    यूजीसी रेग्युलेशन रूल्स 3(सी) के अनुसार, “जाति-आधारित भेदभाव” का अर्थ है “केवल जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध किया गया भेदभाव। याचिकाकर्ता, अधिवक्ता विनीत जिंदल का कहना है कि यह प्रावधान अपने वर्तमान स्वरूप में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग से इतर श्रेणियों से संबंधित व्यक्तियों को शिकायत निवारण और संस्थागत संरक्षण से वंचित करता है।

    प्रावधान को लागू करने या इसके आधार पर रोक की मांग

    उन्होंने गुहार लगाई है कि संबंधित अथॉरिटी को इस प्रावधान को लागू करने या इसके आधार पर कोई कार्रवाई करने से रोका जाए। इसके बजाय, जाति-आधारित भेदभाव को जाति-तटस्थ और संवैधानिक रूप से अनुरूप तरीके से परिभाषित किया जाए, ताकि जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करने वाले सभी व्यक्तियों को, उनकी जातिगत पहचान की परवाह किए बिना, संरक्षण मिल सके।

    इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी प्राधिकरणों (केंद्र सरकार और यूजीसी) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की भी मांग की है कि रेग्युलेशन के तहत स्थापित समान अवसर केंद्र, इक्विटी हेल्पलाइन, जांच तंत्र की कार्यवाहियां, रेग्लुएशन की धारा 3(सी) पर उचित पुनर्विचार होने तक, भेदभाव-रहित और जाति-तटस्थ तरीके से सभी के लिए उपलब्ध कराई जाएं। याची ने गुहार में कहा कि जातिगत पहचान के आधार पर शिकायत निवारण तंत्र से वंचित किया जाना अस्वीकार्य है और राज्य में भेदभाव” के समान है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

    याचिका में क्या कहा गया?

    याचिका में इस आधार पर विनियमन को चुनौती दी गई है कि इसमें जाति-आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। याचिका में कहा गया है कि “जाति-आधारित भेदभाव” की परिधि को केवल एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों तक सीमित करके, यूजीसी ने प्रभावी रूप से “सामान्य” या गैर-आरक्षित वर्ग से संबंधित उन व्यक्तियों को संस्थागत संरक्षण और शिकायत निवारण से वंचित कर दिया है, जिन्हें भी अपनी जातिगत पहचान के आधार पर उत्पीड़न या पक्षपात का सामना करना पड़ सकता है।

    24 जनवरी को भी सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका

    इससे पहले 24 जनवरी को इस रेग्युलेशन को एक अन्य याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को प्रतिवादी बनाया गया था और यूजीसी के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया है कि रेग्युलेशन 3 (सी) को मनमाना और भेदभावपूर्व करार दिया जाए और इसे गैर संवैधानिक घोषित किया जाए। यूजीसी के रेग्युलेशन 3 (सी) को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा गया है कि यह नियम एससी एसटी और ओबीसी तक सीमित किया गया है और यह भेदभावपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि यह नियम समानता के अधिकार और जीवन व स्वच्छंदता के अधिकार का उल्लंघन करता है। याची मृत्युंजय तिवारी की ओर से दाखिल याचिका में नियम 3 (सी) को चुनौती दी गई है और कहा गया है कि यह भेदभाव करता है।

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।