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  • रोहित वेमुला की मौत के दस साल बाद भी कैंपस सुधार क्यों हैं अधूरे?

    सुमित बौध : ‘मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था। कार्ल सागन की तरह विज्ञान का लेखक…’ रोहित वेमुला ने 17 जनवरी, 2016 को अपनी मौत से कुछ दिन पहले ये शब्द लिखे थे। दस साल बाद भी ये शब्द आज हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि यह सिर्फ एक आत्महत्या की


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    By Azad Hind Desk जनवरी 18, 2026
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    सुमित बौध : ‘मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था। कार्ल सागन की तरह विज्ञान का लेखक…’ रोहित वेमुला ने 17 जनवरी, 2016 को अपनी मौत से कुछ दिन पहले ये शब्द लिखे थे। दस साल बाद भी ये शब्द आज हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि यह सिर्फ एक आत्महत्या की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय विश्वविद्यालयों की उस विफलता की गवाही है, जो प्रतिभा को पहचानने, संवारने और सुरक्षित रखने में नाकाम रही।

    रोहित की मौत के बाद पिछले एक दशक में विश्वविद्यालयों में स्पष्ट तौर पर सुधार देखने को मिले हैं। विश्वविद्यालयों में अब जातिगत भेदभाव के खिलाफ नियम, शिकायत निवारण कमेटियां हैं, जो नैतिक दबाव और न्यायिक जांच के फलस्वरूप विकसित हुए हैं। कागजों पर यह सिस्टम 2016 की तुलना में कहीं अधिक उत्तरदायी प्रतीत होती है। फिर भी एक प्रश्न अभी भी अनसुलझा है कि क्या इन सुधारों ने विश्वविद्यालयों की सोच और पढ़ाने के तरीके को बदला है, या सिर्फ शिकायतों को संभालने का तरीका?

    ज्ञान पर नहीं, प्रक्रिया पर ध्यान

    देरी से कार्रवाई, शिकायतों को ठीक से न संभालना और संस्थागत उदासीनता को लेकर रोहित वेमुला की मौत को अक्सर प्रक्रिया की विफलता के रूप में देखा जाता है। लेकिन असल ज्ञान की विफलता थी। विश्वविद्यालय नियम लागू कर सकते थे, लेकिन वे उस सीखने की दुनिया को नहीं समझ पाए जिसमें रोहित प्रवेश करना चाहता था। यह समस्या आज भी जारी है। शिकायत निवारण तंत्र तो बढ़ गए हैं, लेकिन वे अभी भी पुरानी सोच वाले अकादमिक माहौल में काम करते हैं। इसमें यह तय होता है कि क्या पढ़ाया जाए, किसका ज्ञान मायने रखता है, कौन सी कहानियां किनारे कर दी जाती हैं, और अंतिम फैसला किसका होता है।

    अक्सर, जिन लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है, उनके पास फैसले लेने का अधिकार नहीं होता। पाठ्यक्रम का फैसला आमतौर पर सामाजिक रूप से एक ही विचारधारा वाले फैकल्टी सदस्यों के बीच ही होता है। वे अपनी पुरानी सोच को ही सही मानते हैं। पाठ्यक्रम में बदलाव का विरोध सीधे तौर पर न भी हो, तो भी वह रुकावट पैदा करता है। यह देरी, काम का बोझ या अकादमिक तटस्थता का दावा बनकर सामने आता है। नतीजा यह होता है कि मौजूदा ज्ञान वैसा ही बना रहता है, जबकि बदलाव की मांग को बाहरी, वैकल्पिक या किसी और की जिम्मेदारी मान लिया जाता है।

    नियमों के पालन में विश्वविद्यालय हुए बेहतर

    पिछले 10 सालों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो विश्वविद्यालय नियमों का पालन दिखाने में बहुत बेहतर हो गए हैं। । सबसे अच्छे मामलों में, समितियां बनती हैं, समय-सीमा तय होती है, सुनवाई होती है और रिपोर्ट लिखी जाती है। प्रक्रिया के इस विस्तार से विश्वविद्यालयों की जवाबदेही तय होती है। रोहित वेमुला और बाद में पायल तडवी की मौत के बाद, UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नियमों और संस्थागत शिकायत ढांचों को मजबूत करने की कोशिश की गई।

    13 जनवरी को UGC ने भेदभाव-विरोधी नियमों को संशोधित किया। लेकिन कई शिकायतकर्ताओं के लिए, यह समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसे दबाने जैसा है। नुकसान को छोटे स्तर पर स्वीकार किया जाता है, जिम्मेदारी बांट दी जाती है, और नतीजों को गलतफहमी बताया जाता है, न कि शक्ति का प्रदर्शन।

    UGC द्वारा बनाए गए इन तंत्रों तक पहुंच भी सबसे के लिए बराबर नहीं है। कोई भी औपचारिक प्रक्रिया शुरू होने से पहले छात्र और जूनियर फैकल्टी खुद पर शक करते हैं, उन्हें देरी, अस्पष्टता का सामना करना पड़ता है। जब यह प्रक्रिया आगे बढ़ती भी है तो समय ही इनके लिए मुसीबत बन जाता है, कोर्स खत्म हो जाता है, पूरा सेमेस्टर खत्म हो जाता है और समस्या के निदान के बजाय उसे प्रशासनिक रूप से बंद कर दिया जाता है।

    एक मुख्य कारण यह है कि भेदभाव-विरोधी तंत्रों से वह काम करने को कहा जा रहा है जिसके लिए वे बने ही नहीं थे। वे भेदभाव को एक व्यक्तिगत गलती मानते हैं, जिसे पूछताछ और स्पष्टीकरण से सुधारा जा सकता है। लेकिन जाति-आधारित नुकसान अक्सर संरचनात्मक होता है। यह इस बात में छिपा होता है कि सिलेबस किसे महत्व देता है या क्या छोड़ देता है, किन विचारों को जरूरी माना जाता है और किन्हें वैकल्पिक, और पाठ्यक्रम में बदलाव के प्रयासों को कैसे सुगम बनाया जाता है या रोका जाता है। जब नुकसान इन स्थितियों से पैदा होता है, तो शिकायत प्रक्रियाएं उसे पहचानने में संघर्ष करती हैं क्योंकि ज्ञान प्रणाली पर ही सवाल नहीं उठाया जाता।

    यही कारण है कि इरादा एक सुविधाजनक बचाव बन जाता है। संस्थाएं जोर देती हैं कि भेदभाव करने का कोई इरादा नहीं था, जैसे कि भेदभाव तभी होता है जब उसे खुलकर घोषित किया जाए। लेकिन जाति अक्सर रोजमर्रा के फैसलों, पुरानी पाठ्यपुस्तकों और अनजाने नियमों के माध्यम से काम करती है। ये पूर्वाग्रह खुद को बताते नहीं हैं, फिर भी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं। ऐसे में, शिकायत तंत्र शिकायतकर्ताओं को संभालने लगते हैं, बजाय उन स्थितियों का सामना करने के जिनसे शिकायतें पैदा होती हैं।

    प्रक्रिया को बेहतर बनाने की नहीं समझने की जरूरत

    रोहित वेमुला की मौत के दस साल बाद, भारतीय विश्वविद्यालयों के सामने चुनौती सिर्फ प्रक्रिया को बेहतर बनाने की नहीं है, बल्कि यह समझने की है कि उनके सिस्टम क्या बचाते हैं और क्या दोहराते हैं। भेदभाव-विरोधी उपाय केवल प्रशासनिक कार्य नहीं रह सकते, जो शिक्षण, पाठ्यक्रम और संस्थागत आत्म-समझ से अलग हो। यदि शिकायत तंत्रों को महत्वपूर्ण बनना है, तो उन्हें जाति-विरोधी ज्ञान, पाठ्यक्रम की जवाबदेही और संरचनात्मक नुकसान को स्वीकार करने की इच्छा के साथ जोड़ा जाना चाहिए। अन्यथा, सुधार एक न्याय के बिना नियम और बदलाव के बिना प्रक्रिया की एक रस्म बनकर रह जाएगी।

    (बौध ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं। ये विचार उनके निजी हैं।)

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