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  • लेख: कनाडा अब वो कनाडा नहीं रहा, जानिए जस्टिन ट्रूडो की विदाई से कैसे पिघल गई भारत संग रिश्तों पर जमी बर्फ

    भारत और कनाडा के रिश्तों पर हालिया बरसों में जमी बर्फ अब पिघल रही है। पीएम मार्क कार्नी की यात्रा को इस नजरिये से देखा जाना चाहिए कि बदले वैश्विक हालात में कनाडा को भारत की अहमियत समझ आने लगी है। आज से शुरू हो रहा यह दौरा द्विपक्षीय रिश्तों के लिए भी नई शुरुआत


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    By Azad Hind Desk फरवरी 27, 2026
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    भारत और कनाडा के रिश्तों पर हालिया बरसों में जमी बर्फ अब पिघल रही है। पीएम मार्क कार्नी की यात्रा को इस नजरिये से देखा जाना चाहिए कि बदले वैश्विक हालात में कनाडा को भारत की अहमियत समझ आने लगी है। आज से शुरू हो रहा यह दौरा द्विपक्षीय रिश्तों के लिए भी नई शुरुआत हो सकता है।

    ट्रूडो से अलग

    पिछले साल मार्च में पद संभालने के बाद से कार्नी ने नई दिल्ली के साथ संबंधों को लेकर संतुलित रुख दिखाया है। उनका रवैया पूर्ववर्ती जस्टिन ट्रूडो से बिल्कुल अलग रहा, जिन्होंने अलगाववादी खालिस्तानी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारतीय एजेंसियों पर लगाया था और जिसकी वजह से द्विपक्षीय रिश्ते बिल्कुल ही निचले स्तर पर पहुंच गए थे।

    CEPA पर बात

    पिछले साल जून और फिर नवंबर में पीएम नरेंद्र मोदी और कार्नी की मुलाकातों से नुकसान की भरपाई शुरू हुई थी। दोनों देशों ने लंबे समय से लंबित व्यापार और निवेश समझौते CEPA पर बातचीत शुरू करने पर तब सहमति जताई थी। इस मुलाकात में इस मुद्दे पर बात आगे बढ़ेगी। CEPA पर वार्ता डेढ़ दशक से अटकी हुई थी। दोनों देशों ने 2030 तक 70 अरब डॉलर के वार्षिक व्यापार का लक्ष्य रखा है और समझौते से इसमें मदद मिलेगी।

    नए मौके

    दोनों देश पिछली मुलाकातों और बैठकों के बाद हुई प्रगति का जब जायजा लेंगे, तो उनके पास नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का भी मौका होगा। व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और शिक्षा पर फिर से बातचीत शुरू हो रही है। कनाडा से भारत को यूरेनियम आपूर्ति बढ़ाने की भी बात हो रही है। भारत विकल्प देख रहा है कि किस तरह से कनाडा से कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाई जा सकती है। साथ ही, पाइपलाइन और टर्मिनल जैसे इंफ्रा में निवेश पर विचार है।

    मजबूत आधार

    भारत और कनाडा के बीच 2024 में वस्तु व्यापार 13.3 अरब डॉलर था। इसमें से कनाडा ने 5.3 अरब डॉलर का निर्यात किया था। सर्विस ट्रेड भी तेजी से बढ़ा है। यह बताता है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग की मजबूत जमीन मौजूद है और अब उसका फायदा उठाने का समय आ गया है।

    सहयोग की जरूरत

    दोनों देशों को अमेरिका की टैरिफ नीतियों के नुकसान उठाने पड़े हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद टैरिफ भले कम हुआ हो, पर अनिश्चितता बढ़ गई है। कार्नी उन चंद नेताओं में हैं, जिन्होंने ट्रंप की नीतियों के खिलाफ दावोस जैसे मंच पर बोलने की हिम्मत की। वहीं, भारत ने भी विदेश नीति में किसी तरह के दबाव को मानने से इनकार किया। दोनों का आपसी सहयोग उन्हें और मजबूती देगा।

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