चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने मंगलवार को कहा कि नोटा (None of the Above) का ऑप्शन बेहतर कैंडिडेट को मैदान में खींचने और वोटर को अपनी वोटिंग का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। कोर्ट ने कहा कि एक दशक के अनुभव से पता चलता है कि बहुत कम प्रतिशत में वोटर्स इस ऑप्शन का इस्तेमाल करते हैं।
क्या है मामला?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की एक PIL पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन इलाकों में नोटा को कैंडिडेट बनाने की बात कही गई थी, जहां सिर्फ एक कैंडिडेट मैदान में हो, ताकि यह पता चल सके कि अकेले कैंडिडेट पर वोटर का भरोसा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि नोटा को कैंडिडेट बनाने के लिए, पार्लियामेंट को रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट में बदलाव करना होगा।
नोटा पर क्या दलीलें दी गईं?
सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कहा कि नोटा को कैंडिडेट के तौर पर बैलेट में रखने से पैसे और ताकत वाले कैंडिडेट अपने विरोधियों को मुकाबले से हटाने के लिए हिम्मत हारेंगे। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि जब वोटिंग फंडामेंटल राइट नहीं है, तो आर्टिकल 32 के तहत PIL कैसे मेंटेनेबल हो सकती है, जो फंडामेंटल राइट्स के उल्लंघन के मामले में सीधे SC जाने का रास्ता है।
- अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘ज्यूडिशियरी को यह तय नहीं करने देना चाहिए कि RP एक्ट में क्या बदलाव किए जाने हैं। यह पार्लियामेंट को तय करना है कि किसी कमी को ठीक करने की ज़रूरत है या किसी कानून में कोई बदलाव किया जाना है।’
- बेंच ने कहा कि पढ़े-लिखे और अमीर लोग ही हैं जो बड़ी संख्या में वोट देने नहीं आते, जो ग्रामीण इलाकों के लोगों से बिल्कुल अलग है, जहां वोटिंग का दिन एक त्योहार जैसा होता है जिसे हर कोई अपने वोट का इस्तेमाल करके मनाता है।
- सरकार ने अपने हलफनामे में PIL का विरोध किया था और कहा था, ‘नोटा ऑप्शन वह व्यक्ति नहीं है जिसे किसी चुनाव में सही तरीके से नॉमिनेट किया गया हो, इसलिए उसे रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट, 1951 के तहत कैंडिडेट नहीं माना जा सकता। ‘नोटा’ को कोई बनावटी पहचान नहीं दी जानी चाहिए। ‘नोटा’ सिर्फ एक ऑप्शन या एक एक्सप्रेशन है और ‘कैंडिडेट’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता।’














