स्थायी गुजारा भत्ता (धारा 25)
कोर्ट ने कहा कि जिस जीवनसाथी की शादी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत ‘अमान्य’ (शून्य) घोषित किया गया है, वह भी धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता मांग सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में “कोई भी डिक्री” (anydecree) शब्द का इस्तेमाल हुआ है, जिसमें शादी को रद्द करने वाले फैसले भी शामिल हैं। हालांकि, यह राहत देना कोर्ट के विवेक और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
केस के दौरान खर्च (धारा 24)
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक केस चल रहा है, तब तक भी पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की मांग कर सकती है। भले ही कोर्ट को पहली नजर में लगे कि शादी अवैध है, फिर भी वह धारा 24 के तहत राहत देने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते मांग करने वाले के पास अपनी आय का पर्याप्त साधन न हो।
पति की दलील खारिज
इस मामले में पति (अपीलकर्ता) का तर्क था कि एक अमान्य शादी का कानूनन कोई अस्तित्व नहीं होता (Voidabinitio), इसलिए इसमें पत्नी को अधिकार नहीं मिलने चाहिए। पति ने कहा कि धारा 25 ऐसे मामलों में लागू नहीं होनी चाहिए। वहीं, पत्नी की ओर से दलील दी गई कि धारा 25 महिलाओं की सुरक्षा के लिए संविधान के तहत बनाया गया एक विशेष प्रावधान है। केवल शादी के अवैध होने के आधार पर भरण-पोषण से इनकार करना कानून के उद्देश्य को खत्म कर देगा।
आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि कानून बनाते समय संसद ने तलाक की डिक्री और शादी को शून्य घोषित करने वाली डिक्री में कोई भेदभाव नहीं किया था। कोर्ट ने कहा कि धारा 25(1) का सीधा मतलब है कि अमान्य शादी को इसके दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।














