ब्लूमबर्ग ने शुक्रवार को बताया है कि तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बातचीत “एडवांस्ड स्टेज” पर है। इसमें कहा गया है कि “एक डील होने की बहुत ज्यादा संभावना है।” अगर हम मान लें कि तुर्की, सऊदी और पाकिस्तान वाकई एक ऐसा सैन्य गठबंधन करते हैं, जिसके तहत एक देश पर होने वाला हमला, दूसरे देश पर भी हमला होगा, तो सवाल ये उठेंगे कि क्या ये गठबंधन भारत के लिए चुनौती पेश करेगा? कम से कम पाकिस्तान तो यही प्रोजेक्ट करेगा। लेकिन जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत और इजरायल के लिए ये गठबंधन सरदर्द साबित नहीं होगा।
तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी गठबंधन कैसा होगा?
जियो-पॉलिटिक्स की दुनिया में इस गठबंधन को कई लोग ‘इस्लामिक नाटो’ बता रहे हैं। इसे एक बड़ा भू- राजनीतिक बदलाव भी कह रहे हैं। इस गठबंधन के बारे में कहा जा रहा है कि यह एक “पावर का त्रिकोण” बनाता है जो आधुनिक युद्ध में सभी पहलुओं को कवर करता है। क्योंकि सऊदी अरब के पास बेहिसाब पैसा है, जो इस गठबंधन को फंड कर सकता है, पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, जबकि तुर्की के पास NATO की टेक्नोलॉजी के साथ अत्याधुनिक हथियार बनाने की क्षमता है। वो ड्रोन, जहाज और मिसाइलें बनाता है। पाकिस्तान बार बार दिवालिया होने के कगार पर पहुंचता रहता है, लेकिन सऊदी, अपने पैसे से पाकिस्तान के लिए तुर्की TB2/अकिन्सी ड्रोन और स्टील्थ कॉर्बेट्स खरीद सकता है। कम से कम पाकिस्तान ऐसा ही प्रोजेक्ट करेगा और कहेगा कि भारतीय सीमा पर तुर्की की अगली पीढ़ी के हथियार तैनात करेगा।
लेकिन, असल हकीकत कुछ और है। तुर्की, सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट में शामिल होने की पूरी कोशिश इसलिए कर रहा है, क्योंकि उसे ग्रीस-साइप्रस-इजरायल के नये बनने वाले एक्सिस से घिर जाने का डर सता रहा है। तुर्की जानता है कि इजरायल क्या कर सकता है। सऊदी भी इजरायल के ही किसी संभावित हमले से डरकर पाकिस्तान के परमाणु छतरी के नीचे पहुंचा है और तुर्की भी ऐसा ही करना चाहता है। वह सऊदी की वित्तीय शक्ति और पाकिस्तान की न्यूक्लियर क्षमता का फायदा उठाना चाहता है। सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब, एक त्रिपक्षीय डिफेंस पैक्ट बनाना चाहता है, जो तुर्की के नजरिए से इजरायल के खिलाफ होगा और निश्चित रूप से ट्रंप के दखल और गुस्से का कारण बनेगा।
लेकिन वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक फाउंडेशन ऑफ डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज (FDD) के सीनियर रिसर्च फेलो हुसैन अब्दुल हुसैन का मानना है कि “सऊदी और तुर्की की पाकिस्तान के साथ गठबंधन की जल्दबाजी का इजरायल या भारत से कोई लेना-देना नहीं है।” उन्होंने कहा कि “यह गठबंधन इस्लामी ईरान के पतन और एक ज्यादा मजबूत, ज्यादा मुखर ईरान के उदय की उम्मीद में किया जा रहा है। यह उभरता हुआ नया ईरान विरोधी गठबंधन सुन्नी बनाम शिया है।”
क्या ये पार्टनरशिप टिक पाएगी?
अंकारा-रियाद पार्टनरशिप टिकेगी या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है। जिसकी शुरुआत सीरिया से होती है। बशर अल-असद के बाद ईरान के कंट्रोल से आजाद सीरिया, सऊदी अरब के लिए एक स्ट्रेटेजिक जीत है। वहीं, तुर्की, जिसे इस नतीजे का आर्किटेक्ट माना जाता है, वो अब फायदे में है। तुर्की के सैनिक उत्तर-पश्चिम में बने हुए हैं, दमिश्क के साथ एक डिफेंस पैक्ट पर काम चल रहा है और अंकारा, जिससे इजरायल को बहुत चिढ़ है, वो सेंट्रल सीरिया में एक मिलिट्री बेस बनाने की योजना बना रहा है। लेकिन फिलहाल एर्दोगन बहुत ज्यादा हावी दिखने से बचना चाहते हैं। वह अरब या इजरायली विरोध को भड़काना नहीं चाहते और जानते हैं कि तुर्की अकेले सीरिया के पुनर्निर्माण का बोझ नहीं उठा सकता। एक्सपर्ट्स का मानना है कि पहला तो इस गठबंधन के बनने की संभावना काफी कम है और अगर बन भी जाता है, इसके टिकने की संभावना नहीं होगी।













