यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के करीबी सहयोगी सऊदी और यूएई में 2023 से 2026 तक लगातार टकराव बढ़ा है। इन तीन वर्षों में दोनों का यमन और सूडान में प्रॉक्सी वॉर सीधे टकराव में बदल गया है। यमन और सूडान में सामरिक मतभेदों के रूप में शुरू हुआ तनाव अब संघर्ष के मुहाने पर है। हाल ही में यह सामने आया, जब सऊदी अरब ने यूएई समर्थित गुटों की ‘जीवनरेखा’ बने एक बंदरगाह पर हवाई हमले किए और यूएई के बलों को यमन छोड़ना पड़ा।
यूएई और सऊदी के संबंध
बीते कई वर्षों बल्कि दशकों में पहली बार खाड़ी के ये दो सबसे शक्तिशाली देश ऐसे स्थिति में हैं, जब वे प्रतिद्वंद्वी मिलिशिया का समर्थन कर रहे हैं। यमन में यह साफ दिखा है तो सूडान समेत कई दूसरे इलाकों में भी यह टकराव उभरा है। इससे सवाल उठता है कि दो दोस्त कैसे दुश्मन बन गए। इसका जवाब सोना, तेल, बंदरगाहों पर कंट्रोल से लेकर क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने तक में छिपा है।
यूएई और सऊदी के रिश्ते में दरार की एक अहम वजह लाल सागर, हॉर्न ऑफ अफ्रीका, होर्मुज जलडमरूमध्य और दक्षिणी अरब प्रायद्वीप में रणनीतिक संसाधनों और गलियारों पर नियंत्रण का प्रतिस्पर्धा है। खासतौर से रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद सऊदी अरब और UAE को एहसास हुआ कि केवल तेल बाजार काफी नहीं है। ताकत के लिए बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स हब, खनिज तक पहुंच और प्रॉक्सी-सुरक्षित क्षेत्र चाहिए।
संयुक्त युद्ध से क्षेत्रीय युद्ध तक
साल 2015 में सऊदी अरब ने यमन में हस्तक्षेप किया तो UAE उसका सबसे भरोसेमंद सैन्य भागीदार था। दोनों गठबंधन में यमन के हूतियों से कई साल लड़ते रहे लेकिन 2023 के आते-आते दोनों के लक्ष्य बदल गए। सऊदी अरब एक कमजोर लेकिन एकजुट यमन चाहता था। किसी भी तरह के बंटवारे से सऊदी सीमा सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ, जो यूएई के विचार के उलट था।
दूसरी ओर UAE के लिए यमन एक रणनीतिक रियल एस्टेट नक्शा बन गया, जिसमें अदन, मुकल्ला, सोकोट्रा पर नियंत्रण, लाल सागर के समुद्री मार्गों पर प्रभाव और बंदरगाहों, ऊर्जा बुनियादी ढांचे तक पहुंच शामिल थी। यूएई ने इसके लिए यमन में सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) को समर्थन किया। इससे टकराव बढ़ा और नतीजा हाल ही में यमन में सऊदी के हवाई हमले के तौर पर निकला।
सूडान: सोना, बंदूकें और खाड़ी की दुश्मनी
यमन के अलावा अफ्रीकी देश सूडान में भी दो मुल्कों के दोस्त से दुश्मन बनने की कहानी है। सूडान में गृह युद्ध 2023 में शुरू हुआ लेकिन सऊदी-यूएई में यहां खींचतान उससे पहले शुरू हो गई थी। सूडान में ना सिर्फ कुदरत के खजाने का बड़ा जखीरा है, यह रणनीतिक तौर पर भी अहम है। यह देश अफ्रीका के सबसे बड़े सोने के उत्पादकों में से है। सूडान लाल सागर और साहेल के बीच गेटवे और अफ्रीका को खाड़ी बंदरगाहों से जोड़ने वाला लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर है।
सूडान में यूएई ने रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) के साथ संबंध बनाए। यह अर्धसैनिक संगठन सोने की खदानों, तस्करी के रास्तों और सीमावर्ती इलाकों को कंट्रोल करता है। इससे उसे संसाधनों तक सीधी पहुंच मिली। दूसरी ओर सऊदी ने सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) का समर्थन किया। सऊदी से मिले समर्थन की वजह से सूडानी बलों ने आरएसएफ को झटका दिया। यह इस गुट के साथ-साथ यूएई के लिए भी झटका और सऊदी से तनाव बढ़ाने वाला साबित हुआ।
टकराव की वजह बनता रुख
दोनों देश के गहरे टकराव में रणनीतिक वजह साफ दिखती हैं। सऊदी अरब चाहता है कि सीमाओं का सम्मान हो और किसी देश में राजधानी से प्रभाव डाला जाए। वहीं UAE का नजरिया अलग है। UAE सिर्फ अपनी पहुंच चाहता है। उसे स्वामित्व के बिना क्षेत्र पर नियंत्रण में कोई हिचकिचाहट नहीं है।
सऊदी-यूएई का साथ अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है। यमन और सूडान से आगे दोनों मुल्क भविष्य की प्रतिद्वंद्विता के लिए टेम्पलेट बन गए हैं। इसमें लाल सागर के बंदरगाह, अफ्रीकी संसाधन और खाड़ी देशों में प्रॉक्सी गुटों को समर्थन शामिल है। स्थिति अब गठबंधन से आगे बढ़कर प्रतिस्पर्धा में बदल गई है।
खाड़ी से परे पड़ेगा प्रभाव
सऊदी-UAE दरार एक एकजुट खाड़ी गुट के विचार को कमजोर करती है। इससे क्षेत्र में और ज्यादा आर्थिक प्रतिस्पर्धा होगी। यह टकराव ईरान, तुर्की और बाहरी शक्तियों के लिए इस क्षेत्र में अपने हितों के लिए किसी फायदा उठाने का मौका देती है। यह दरार छोटे खाड़ी देशों को बचाव करने और अमेरिका की रणनीतिक योजना को जटिल बनाने के लिए मजबूर करेगी।
सितंबर 2025 में पाकिस्तान-सऊदी अरब के बीच रणनीतिक रक्षा समझौता हुआ। इसके बाद इस साल 19 जनवरी को UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की भारत यात्रा हुई। यह दिखाता है कि यूएई भी सऊदी के खिलाफ एक मजबूत गुट बनाना चाहते हैं। इसके लिए वह भारत और इजरायल जैसे देशों की ओर देख रहा है।
क्या होगा संघर्ष का नतीजा
सऊदी-यूएई के तनाव से पश्चिम एशिया एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहा है, जिसमें पैसा, मिलिशिया और लॉजिस्टिक्स के जरिए लड़ाई लड़ी जाएगी। कह सकते हैं कि इस संघर्ष ने परिदृश्य को भाईचारे से संसाधन की दौड़ में बदल दिया है। सऊदी अरब और यूएई का टकराव दिखाता है कि जब सोना, बंदरगाह और प्रभाव की बात आती है तो भाईचारा प्रतिद्वंद्विता में बदल जाता है।
हालांकि यहां यह साफ कर देना जरूरी है कि सऊदी-UAE संबंध पूरी तरह से टूटे नहीं है लेकिन साझेदारी से एक खराब तरह की प्रतिस्पर्धा में बदल गए हैं। यह इसलिए भी चिंता बढ़ाता है क्योंकि क्षेत्र के कई देश गृहयुद्ध से जूझ रहे हैं। इन दो शक्तियों का टकराव और पहले से अशांत अरब जगत में और ज्यादा आर्थिक अस्थिरता लाएगा।













