वनवेब में भारती एंटरप्राइजेस की हिस्सेदारी भी है जो भारत में ‘एयरटेल’ को चलाती है। INSV कौंडिन्य जहाज इसलिए सबसे खास है क्योंकि इसे 2 हजार साल पुरानी पाल विधि से बनाया गया है। इतनी पुरानी विधि से बनाए जाने की वजह से इसमें कोई कम्युनिकेशन सिस्टम नहीं था। ऐसे में सैटेलाइट कनेक्टिविटी को इस जहाज से जोड़ा गया। जहाज में वनवेब लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट कनेक्टिविटी को लगाया गया। कंपनी का कहना है कि पूरी यात्रा के दौरान सैटेलाइट कनेक्टिविटी ने अपना काम किया। यात्रा का मकसद समुद्री व्यापार मार्गों को फिर से खोजना, भारत की समृद्ध समुद्री विरासत को दिखाना और राष्ट्रीय गौरव को बढ़ावा देना है।
सैटेलाइट इंटरनेट से बाकी दुनिया से जुड़ा क्रू
आज़ाद हिन्द टेक के पास आई जानकारी के अनुसार, वनवेब की सैटेलाइट इंटरनेट कनेक्टिविटी की वजह से जहाज पर मौजूद लोगों ने भरोसेमंद और रियल-टाइम कम्युनिकेशन किया। जैसाकि हमने बताया इस जहाज को पुरानी विधि से बनाया गया है, इसलिए इसमें कम्युनिकेशन की कोई सुविधा नहीं थी। ऐसे में वनवेब की LEO तकनीक को जहाज पर इस्तेमाल किया गया।
‘क्रू के लिए कीमती रही सैटेलाइट कनेक्टिविटी’
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य और कौंडिन्य प्रोजेक्ट के मुख्य सदस्य और आर्किटेक्ट, साजीव सान्याल ने कहा कि पूरी यात्रा के दौरान, एयरटेल वनवेब से मिली भरोसेमंद सैटेलाइट कनेक्टिविटी क्रू के लिए बहुत कीमती रही। इसने हमें जमीन पर मौजूद टीमों से जुड़े रहने में मदद की, जिससे संचार, लाइव फीड और मुश्किल समुद्री सफर के दौरान उनका मनोबल बना रहा।
वनवेब के सैटेलाइट नेटवर्क की मदद से यात्रा से जुड़े लाइव अपडेट भेजे गए। यह दिखाता है कि कैसे सैटेलाइट कनेक्टिविटी किसी मिशन के लिए मजबूत और टिकाऊ है। ईटेलसैट की APAC की रीजनल वाइस प्रेसिडेंट और वनवेब इंडिया की बोर्ड डायरेक्टर, नेहा इडनानी ने कहा कि हमें इस बात का गर्व है कि ईटेलसैट को इस ऐतिहासिक यात्रा के लिए कनेक्टिविटी देने का मौका मिला।














